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سُوْرَةُ الضُّحٰي

Surah Ad-Duha

The Morning Hours

93 / 11411 आयतेंमक्की

अनुवाद: Suhel Farooq Khan & Saifur Rahman Nadwi

بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ

بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ

وَٱلضُّحَىٰ (1)

(ऐ रसूल) पहर दिन चढ़े की क़सम

وَٱلَّيۡلِ إِذَا سَجَىٰ (2)

और रात की जब (चीज़ों को) छुपा ले

مَا وَدَّعَكَ رَبُّكَ وَمَا قَلَىٰ (3)

कि तुम्हारा परवरदिगार न तुमको छोड़ बैठा और (न तुमसे) नाराज़ हुआ

وَلَلۡأٓخِرَةُ خَيۡرࣱ لَّكَ مِنَ ٱلۡأُولَىٰ (4)

और तुम्हारे वास्ते आख़ेरत दुनिया से यक़ीनी कहीं बेहतर है

وَلَسَوۡفَ يُعۡطِيكَ رَبُّكَ فَتَرۡضَىٰٓ (5)

और तुम्हारा परवरदिगार अनक़रीब इस क़दर अता करेगा कि तुम ख़ुश हो जाओ

أَلَمۡ يَجِدۡكَ يَتِيمࣰ ا فَـَٔاوَىٰ (6)

क्या उसने तुम्हें यतीम पाकर (अबू तालिब की) पनाह न दी (ज़रूर दी)

وَوَجَدَكَ ضَآلࣰّ ا فَهَدَىٰ (7)

और तुमको एहकाम से नावाकिफ़ देखा तो मंज़िले मक़सूद तक पहुँचा दिया

وَوَجَدَكَ عَآئِلࣰ ا فَأَغۡنَىٰ (8)

और तुमको तंगदस्त देखकर ग़नी कर दिया

فَأَمَّا ٱلۡيَتِيمَ فَلَا تَقۡهَرۡ (9)

तो तुम भी यतीम पर सितम न करना

وَأَمَّا ٱلسَّآئِلَ فَلَا تَنۡهَرۡ (10)

माँगने वाले को झिड़की न देना

وَأَمَّا بِنِعۡمَةِ رَبِّكَ فَحَدِّثۡ (11)

और अपने परवरदिगार की नेअमतों का ज़िक्र करते रहना