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سُوْرَةُ التِّيْنِ

Surah At-Tin

The Fig

95 / 1148 आयतेंमक्की

अनुवाद: Suhel Farooq Khan & Saifur Rahman Nadwi

بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ

بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ

وَٱلتِّينِ وَٱلزَّيۡتُونِ (1)

इन्जीर और ज़ैतून की क़सम

وَطُورِ سِينِينَ (2)

और तूर सीनीन की

وَهَٰذَا ٱلۡبَلَدِ ٱلۡأَمِينِ (3)

और उस अमन वाले शहर (मक्का) की

لَقَدۡ خَلَقۡنَا ٱلۡإِنسَٰنَ فِيٓ أَحۡسَنِ تَقۡوِيمࣲ‏ (4)

कि हमने इन्सान बहुत अच्छे कैड़े का पैदा किया

ثُمَّ رَدَدۡنَٰهُ أَسۡفَلَ سَٰفِلِينَ (5)

फिर हमने उसे (बूढ़ा करके रफ्ता रफ्ता) पस्त से पस्त हालत की तरफ फेर दिया

إِلَّا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَعَمِلُواْ ٱلصَّٰلِحَٰتِ فَلَهُمۡ أَجۡرٌ غَيۡرُ مَمۡنُونࣲ‏ (6)

मगर जो लोग ईमान लाए और अच्छे (अच्छे) काम करते रहे उनके लिए तो बे इन्तेहा अज्र व सवाब है

فَمَا يُكَذِّبُكَ بَعۡدُ بِٱلدِّينِ (7)

तो (ऐ रसूल) इन दलीलों के बाद तुमको (रोज़े) जज़ा के बारे में कौन झुठला सकता है

أَلَيۡسَ ٱللَّهُ بِأَحۡكَمِ ٱلۡحَٰكِمِينَ (8)

क्या ख़ुदा सबसे बड़ा हाकिम नहीं है (हाँ ज़रूर है)